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इस लेख के शीर्षक से शायद ज्यादातर पुरुष वर्ग के लोगों को तकलीफ हो की उन्हें भी बलात्कारी जैसे शब्दों से सामान्यीकरण करके गलत किया जा रहा है |
वो इस तरह के कदम में शामिल नहीं है | पर अगर एक लड़की की नज़र से देखा जाए तो आपको समझ आ जायेगा की ये शीर्षक कितना सार्थक है |
बढ़ते सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभाव से शहर में होने वाले कुछ छेड़छाड़ के मामले या रेप के मामले प्रकाश में जरुर आ जाते हैं, किन्तु इतना ही सत्य नहीं है इस पक्ष का |
अगर किसी लड़की के पुरे जीवन को शुरुआत से आकलन किया जाये तो आपको पता लगेगा की कैसे उसे बचपन में पुरुष रिश्तेदारों से इस तरह की गन्दी हरकतें बर्दाश्त करनी पड़ी है, थोड़ी बड़ी होने और स्कूल जाने के बाद स्कूल टीचर , क्लास मेट लड़के उनसे छेड़छाड़ करते हैं और गन्दी नज़रों का शिकार होती है | कॉलेज जाने के उम्र में तो ये समस्या और बढ़ जाती है | अंत में जब वो नौकरी करने को जाती है तब ऑफिस के कई पुरुष भी उसे इसी तरह का बर्ताव करते है |
इस कारण कोई भी लड़की या महिला जब सड़क पर चलती है या कहीं भी किसी अनजान पुरुष को देखती है जहाँ वो अकेली हो तो वो खुद को असुरक्षित महसूस करती है | असुरक्षित महसूस करने का उसका एक मात्र कारण है उसका वो डर जो उसे बचपन से लेकर ऑफिस तक में पुरुष समाज से व्यव्हार के रूप में मिला है | हाल के ही बंगलोर में हुई घटना जिसमे लड़की एक सुनसान गली में अकेले जा रही होती है उसके पीछे से दो लड़के पीछा करते हुए आते है और उसके साथ छेड़छाड़ करते है | उस लड़के की हिम्मत इतनी है की लड़की के विरोध के बावजूद वो लड़की को स्कूटी पर आगे लादकर जबरदस्ती अपहरण करके कहीं दुसरे स्थान पर ले जाना चाह रहा था शायद गैंग-रेप के लिए ! वहां पर ही गली के नुक्कड़ पर कई पुरुषों के तमाशबीन होने की तस्वीर भी मिल रही है | उतने सारे पुरुष और इधर सिर्फ दो लड़के किन्तु फिर भी लड़की असहाय दिख रही है फिर क्या कहा जाये ? अगर महिला ये सोचती है की सारे मर्द बलात्कारी है तो इसमें क्या गलत है ? अगर गलत है तो साबित करना पड़ेगा पुरुष समाज को महिलाओं की मदद को आगे आकर | वरना परिश्तिथियाँ और बिगडती जाएँगी | अब गेंद पुरुषों के पाले में है वो करना क्या चाहते है !
इसी से जुडा नज़र-बट्टू चैनल का वीडियो है जो देखकर आपको शायद कुछ अंदाज़ा लगे की कैसे महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध को थाम सकते है? ये वीडियो विशेष कर महिलाये जरुर देखें |
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वो इस तरह के कदम में शामिल नहीं है | पर अगर एक लड़की की नज़र से देखा जाए तो आपको समझ आ जायेगा की ये शीर्षक कितना सार्थक है |
बढ़ते सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभाव से शहर में होने वाले कुछ छेड़छाड़ के मामले या रेप के मामले प्रकाश में जरुर आ जाते हैं, किन्तु इतना ही सत्य नहीं है इस पक्ष का |
अगर किसी लड़की के पुरे जीवन को शुरुआत से आकलन किया जाये तो आपको पता लगेगा की कैसे उसे बचपन में पुरुष रिश्तेदारों से इस तरह की गन्दी हरकतें बर्दाश्त करनी पड़ी है, थोड़ी बड़ी होने और स्कूल जाने के बाद स्कूल टीचर , क्लास मेट लड़के उनसे छेड़छाड़ करते हैं और गन्दी नज़रों का शिकार होती है | कॉलेज जाने के उम्र में तो ये समस्या और बढ़ जाती है | अंत में जब वो नौकरी करने को जाती है तब ऑफिस के कई पुरुष भी उसे इसी तरह का बर्ताव करते है |
इस कारण कोई भी लड़की या महिला जब सड़क पर चलती है या कहीं भी किसी अनजान पुरुष को देखती है जहाँ वो अकेली हो तो वो खुद को असुरक्षित महसूस करती है | असुरक्षित महसूस करने का उसका एक मात्र कारण है उसका वो डर जो उसे बचपन से लेकर ऑफिस तक में पुरुष समाज से व्यव्हार के रूप में मिला है | हाल के ही बंगलोर में हुई घटना जिसमे लड़की एक सुनसान गली में अकेले जा रही होती है उसके पीछे से दो लड़के पीछा करते हुए आते है और उसके साथ छेड़छाड़ करते है | उस लड़के की हिम्मत इतनी है की लड़की के विरोध के बावजूद वो लड़की को स्कूटी पर आगे लादकर जबरदस्ती अपहरण करके कहीं दुसरे स्थान पर ले जाना चाह रहा था शायद गैंग-रेप के लिए ! वहां पर ही गली के नुक्कड़ पर कई पुरुषों के तमाशबीन होने की तस्वीर भी मिल रही है | उतने सारे पुरुष और इधर सिर्फ दो लड़के किन्तु फिर भी लड़की असहाय दिख रही है फिर क्या कहा जाये ? अगर महिला ये सोचती है की सारे मर्द बलात्कारी है तो इसमें क्या गलत है ? अगर गलत है तो साबित करना पड़ेगा पुरुष समाज को महिलाओं की मदद को आगे आकर | वरना परिश्तिथियाँ और बिगडती जाएँगी | अब गेंद पुरुषों के पाले में है वो करना क्या चाहते है !
इसी से जुडा नज़र-बट्टू चैनल का वीडियो है जो देखकर आपको शायद कुछ अंदाज़ा लगे की कैसे महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध को थाम सकते है? ये वीडियो विशेष कर महिलाये जरुर देखें |
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